नई दिल्ली, फुटबॉल के लिए मशहूर इटली में क्रिकेट आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसकी नींव एक श्रीलंकाई प्रवासी के प्रयासों से पड़ी। जब इटली में क्रिकेट का नाम तक कम लोग जानते थे, तब इस श्रीलंकाई क्रिकेट प्रेमी ने स्थानीय युवाओं और प्रवासी समुदाय को जोड़कर खेल को पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया।
शुरुआत छोटे स्तर से हुई—पार्कों में अभ्यास, सीमित संसाधन, और कुछ उत्साही खिलाड़ियों के साथ। लेकिन जुनून और निरंतर प्रयासों ने धीरे-धीरे एक संरचित क्लब संस्कृति को जन्म दिया। प्रवासी श्रीलंकाई समुदाय ने अपने अनुभव और खेल की समझ से इटली में क्रिकेट को संगठित रूप देने में अहम भूमिका निभाई।
मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में टी-20 वर्ल्ड कप के एक मैच में इटली ने नेपाल को 10 विकेट से हराकर इतिहास रच दिया था। यह 78 साल के फ्रांसिस जयराजा के लिए एक चमत्कार था, जो स्टेडियम में बैठकर अपनी आंखों के सामने अपने 50 साल के संघर्ष को जीत में बदलते देख रहे थे। यह कहानी है एक ऐसे देश इटली की, जहां फुटबॉल तो धर्म है, लेकिन क्रिकेट के लिए एक जूनून कुछ लोगों के दिल में धड़कता रहा और इन जुनूनी लोगों ने देश में क्रिकेट को बचाए रखा।
संघर्ष से संरचना तक का सफर
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स्थानीय युवाओं को क्रिकेट के नियम और तकनीक सिखाई गई।
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छोटे टूर्नामेंट और क्लब प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं।
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स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर खेल को बढ़ावा दिया गया।
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प्रवासी समुदाय और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से मैदान और सुविधाएं विकसित की गईं।
समय के साथ इटली की राष्ट्रीय टीम ने भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया। यह बदलाव केवल खेल का विस्तार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समावेशन की कहानी भी है—जहां एक प्रवासी समुदाय ने अपने खेल के माध्यम से नई पहचान बनाई।
आज इटली में क्रिकेट तेजी से बढ़ता खेल बन रहा है। क्लब संरचना मजबूत हो रही है, युवा खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी टीम अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।
यह कहानी बताती है कि जुनून और समर्पण से किसी भी देश में किसी भी खेल की नींव रखी जा सकती है—बस जरूरत होती है एक प्रेरक पहल की।















