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नई दिल्ली,  खेल जगत को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां 15 और 17 साल की दो नाबालिग खिलाड़ी अपने-अपने स्थानों पर फंदे पर टंगी हुई पाई गईं। दोनों प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की अचानक मौत से परिवार, कोच और साथी खिलाड़ी सदमे में हैं। शुरुआती जानकारी के अनुसार, घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई। मामले की जांच जारी है और हर पहलू को ध्यान में रखते हुए पड़ताल की जा रही है।

केरल के कोल्लम स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) हॉस्टल में गुरुवार को दो नाबालिग स्पोर्ट्स ट्रेनी के शव कमरे में फंदे से लटके मिले। पुलिस के मुताबिक, दोनों छात्राएं स्पोर्ट्स कोचिंग ले रहीं थी, और हॉस्टल में ही रह रही थीं। मृत लड़कियों की पहचान कोझिकोड जिले की सैंड्रा (17) और तिरुवनंतपुरम जिले की वैष्णवी (15) के रूप में हुई है।

सैंड्रा एथलेटिक्स की ट्रेनी थी और 12वीं में पढ़ रही थी, जबकि वैष्णवी कबड्डी खिलाड़ी थी और क्लास 10वीं की छात्रा थी। घटना से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।

दोनों के शव एक ही कमरे में लटके मिले घटना गुरुवार सुबह करीब पांच बजे सामने आई, जब हॉस्टल के बाकी साथी ट्रेनी स्पोर्ट्स प्लेयर्स ने देखा कि दोनों लड़कियां सुबह की ट्रेनिंग सेशन में नहीं आईं। दरवाज बार-बार खटखटाने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला, तो हॉस्टल अधिकारी दरवाजा तोड़कर अंदर गए।

वहां दोनों लड़कियां पंखों से लटकी मिलीं। पुलिस के अनुसार वैष्णवी अलग कमरे में रहती थी, लेकिन बुधवार रात वह सैंड्रा के कमरे में सोने आई थी। हॉस्टल की अन्य लड़कियों ने सुबह दोनों को देखा भी था।

इस घटना ने एक बार फिर किशोर खिलाड़ियों की मानसिक सेहत, प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और सपोर्ट सिस्टम पर गंभीर चर्चा छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र के खिलाड़ियों पर उम्मीदों का बोझ, चयन की चिंता और सोशल मीडिया का दबाव मानसिक तनाव बढ़ा सकता है। ऐसे में परिवार, कोच और खेल संस्थानों की जिम्मेदारी बनती है कि वे न केवल शारीरिक प्रशिक्षण पर, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी बराबर ध्यान दें।

खेल संघों और स्कूल स्तर पर काउंसलिंग, नियमित संवाद और सुरक्षित माहौल की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है। कई खेल प्रेमियों और संगठनों ने शोक व्यक्त करते हुए जांच को निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से पूरा करने की मांग की है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

यदि कोई किशोर या खिलाड़ी मानसिक दबाव से जूझ रहा हो, तो समय पर बातचीत, मदद और परामर्श बेहद जरूरी है। परिवार और संस्थानों को चाहिए कि वे संकेतों को गंभीरता से लें और सहयोग का भरोसा दें।