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नई दिल्ली, ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम की छवि दुनिया भर में हमेशा एक ऐसी टीम के रूप में रही है जो मैदान पर अपने आक्रामक रवैये, तीखे शब्दों और लगातार मानसिक दबाव डालने की रणनीति के लिए जानी जाती है। क्रिकेट में “स्लेजिंग” का सबसे प्रचलित रूप गाली-गलौज और अपमानजनक टिप्पणियों के रूप में सामने आता है, और इस कला के “मास्टर” कहे जाने वाले खिलाड़ी अक्सर ऑस्ट्रेलिया से ही होते हैं। सवाल यह है कि आखिर ऑस्ट्रेलिया गाली-गलौज को इतना बड़ा हथियार क्यों मानता है?

क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया सिर्फ गेंद और बल्ले से नहीं जीतता, वो दिमाग से भी खेलता है। मैदान पर उनके शब्द तलवार की तरह चलते हैं, और यही है उनका सबसे पुराना हथियार… स्लेजिंग।

ये सिर्फ गाली-गलौज या बदजुबानी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है जिससे वे विरोधी को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं।

स्टीव वॉ ने इसे नाम दिया ‘मेंटल डिसइंटिग्रेशन’, यानी प्रतिद्वंद्वी की हिम्मत तोड़कर जीतना।

ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट संस्कृति में ये हथियार स्कूल के मैदान से ही गढ़ा जाने लगता है, जहां बहस करना कमजोरी नहीं, खेल का हिस्सा माना जाता है।

तो आखिर कैसे बनी स्लेजिंग ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट की पहचान? क्यों बाकी दुनिया इसे गलत कहती रही, पर ऑस्ट्रेलिया ने इसी को अपनी ताकत बना लिया?

क्रिकेट में स्लेजिंग का मतलब अपोजिशन टीम और उनके प्लेयर्स के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना, जिनसे उनका फोकस टूटे। वे मेंटली ब्रेक हों, खेल पर फोकस नहीं कर सके और मैदान पर अपना 100% नहीं दे पाए।

ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी टीमें अक्सर इस स्ट्रैटजी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते आई हैं। टीम इंडिया जब विराट कोहली और सौरव गांगुली की कप्तानी में खेलती थी, तब भारत की ओर से भी बहुत ज्यादा स्लेजिंग देखने को मिलती थी। साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसी टीमें अक्सर स्लेजिंग करने से दूर ही रहती है।